Friday, 22 May 2026

घोंसला

 
घोसला बना अपना, किसी कोने में हमें अपने वजूद से रूबरू कराती है, 
हम अनसुना अनदेखा न कर दे  इन्हे, तो ची ची ची कर अपनी  उपस्थिति दर्ज कराती है 

मैं चाहती थी बुलाना इन्हें कई बार, दाना भी  डाला, पानी रख घड़े में इंतज़ार किया 
पर आना इन्होने इस बार ही ठाना था.

चुग कर दाना, और कुछ बूंदों से तर कर गला अपना,
झटपट  उड़ जाती है फिर, कुछ तिनको की तलाश में 

कभी बहुत ही उत्तेजित हो हलके आहट से भी 
अपनों नन्हे चिड़ो को खुद में छुपा लेती है !

समय के साथ फिर खुद ही उन्हें खुले आसमान में छोड़ आती है, 

और वह घोंसला, उसका तिनका हमारे बरामदों में बिखेर जा उड़ती हैं किसी और डाली , 
बटोर कर सारे  तिनके, नए घोसले के इंतज़ार में। .... मिनाक्षी 





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