Saturday, 20 April 2024

लाल कुर्ते का बोझ

तलवे उसके फटे  हुए ,पर  मजबूत 

हाथों  की मासपेशियां कसी हुई, भारी सामान का बोझ लिए सर पर 

तेज़ी से लोगो के भीड़ से जगह बनाता जाता है !

सर पर रखी कभी किसी बुढ़िया का बक्सा होता है ,  बेटे के घर के लिए जिसमे  ढेरो पकवान भरा होता है,

तो कभी बेटी के घर से लौट रहा कमजोर बाप का  हल्का सा थैला!

अपने ही बोझ से थके हुए हलके थैले को भी दे देता  है उस सख्त  मांसपेशीय वाले को ! 

सुबह की पहली गाड़ी के आते ही नया भार  उठाने की आस में ,वह चाय बिस्किट खाकर दौड़ जाता है फलना शहर के फलना लोगो की तरफ

हर रोज़ दो शब्द  बतिया लेता है सब से , कोई घर को आता है, कोई घर जाता है, 

कोई नौकरी की तलाश में तो कोई हज़ारो सपने लिए , सबका सामान और रफ़्तार अलग होता है,

 वह सबका ही सामान  उठाता है , सबकी अलग बोली लगाता है !

माथे का पसीना पोंछता अपने लाल गमछे से, वह अकसर दोपहर तक थक जाता है, उसने सीढ़ियां गिन  रखी है , कौन सा डब्बा कहा आएगा, सेठ जी से कितना मोल भाव हो पायेगा, बखूबी जान जाता है 

उसका अपना  सामान हल्का है काफी और ज़िम्मेदारियाँ  भारी,

बेटी का ब्याह करना है, सामान उठाने वाले से नहीं, उठवाने वाले से 

सपने ऐसे उसके आँखों में रोज़ ही तैरते है , काली सिलेट  पर लिखा रेट कार्ड धूमिल पड़  जाता है जब वह दिन का आखिरी बोझ सर से उतारता है!

मिनाक्षी 



Thursday, 18 April 2024

पापा

 

पापा , 

पापा  का होना क्या होता है ये उनके ना होने पे ही आभास होता है 

उनका  सिर्फ याद में होना और पास में ना होना अत्यंत असहनीय होता है ,

पापा ऐसे  जैसे  एक आँगन में  रखी  चारपाई, 

जहाँ पूरा परिवार जमघट लगाए रहता है , 

उनका होना जैसे गांव के बीच  नीम के पेड़ का चबूतरा जहाँ होती है हज़ारो बातें, किस्से कहानिया और नयी कल्पनाये 

पापा ऐसे जैसे उमड़ती नदी का बांध , 

जैसे महफ़िल के ठहाके  या शाबाशी की थाप ! 

उनके जाने से कदम  धीमे , और हौसले कमजोर हो जाते है! कुछ अपने भी बेगाने से हो जाते है !

घर की रौशनी मद्धम और खुशियां फीकी पड़ जाती है ,

 माँ का श्रृंगार और बच्चो  का उल्लास भी खत्म  हो जाता है  

आप हमेशा साथ  रहते है पापा बस आपका प्यार से बुलाना खल जाता है 

माँ का हमारे लिए खुश रहना  पर अकेले में रोना  अब सब समझ आ जाता है !

सुबह मेज़ पर राखी चाय और अख़बार में ढूंढते है  हम आपको , तो कभी किसी पुरानी  पढ़ी किताब में आपके उँगलियों  की खुशबू 

पॉलिटिक्स की चर्चे  नहीं होते अब, क्योकि कोई कड़क आवाज़ में नहीं सुनाता हिस्ट्री मशहूर 

गलती जो हो जाये अब ,तो डांटता  नहीं  कोई, और ना ही  गिरने पर झट से उठाता  ही है 

कुछ हासिल करने पर पीठ भी थपथपाता नहीं कोई, 

हाँ पर आप खुश  होते इससे ये सोच खुश हो जाते है हम सब ! 

पापा का ना होना क्या होता, ये जान गए हम सब।

उनकी अदृश्यता ने सिखाया, कैसे हैं हम अधूरे बिना उनके राब्ते।"


मिनाक्षी  (भावनाओं में शामिल , साक्षी और आकांक्षा ) 





Monday, 8 April 2024

तुम्हारा प्यार

तुम्हारा प्यार जैसे , पहली बरसात 

जैसे गहरी निराशा में भी एक आस 

जैसे कच्ची अमिया, या हो जैसे मिश्री की मिठास 

हो चिलचिलाते धूप में जैसे पेड़ की छाँव 


तुम्हारा प्यार जैसे पूस की रात में दूर सुलगती हुई आग,

या हो जैसे  बिन मांगी मुराद !

तुम्हारा प्यार जैसे लता के गीत 

हो जैसे लगभग हारती हुई जीत !

तुम्हारा प्यार  मेरा पूरा श्रृंगार 


मिनाक्षी .