मेरा कमरा , कुछ कुछ मे्रे जैसा ही है
उसमे रखी है, किताबे, और कुछ पुरानी डायरी , जिसमे कुछ किस्से नए है, पर बहुत से पुराने
हाँ वह दिया, मिटटी का , वही रखा है, अब लॉ जलाती नहीं जिसकी मैं ,
और वह ब्लू वाली दरी , कितनी ही बार हटाया मैंने उसे , पर आज भी बिछी है, वह बिस्तर के ठीक नीचे। कुछ चिट्ठियां अधखुली, पूरी पढ़ी , मेरे पसंदीदा नावेल के बीचोंबीच दबी हुई है !
कलम दान मेरा भरा हुआ है , कीमती कलमों से, लोग समझते है की मैं लिखने की शौक़ीन हूँ !
हर रात वो मोमबत्ती बुझा देती हूँ मैं , क्या लिखू ? यह सोचकर हरबार स्याही सूखा देती हूँ !.
वह दिवार वाली घड़ी याद है? कभी कभी बेवक़्त ही, पीछे खींच ले जाती है मुझे ,
मेज़ पर लगा नया कैलेंडर क्यों मुझे आज से रूबरू करा देता है !
रात जब थक कर दिन के धोखाधड़ी से , आँखे बंद करती हूँ तकिये पर अपनी
चादर की खींचातानी , क्यों सता जाती है आज भी
सपने में अचानक से उचककर जब जाग जाती हूँ, साथ में रखा गिलास गिर जाता है अक्सर ही
प्यासी सी फिर रात के साथ सो जाती हूँ डरकर !
सवेरे सब नया होता है, पुराना होता है तो बस मेरा अक्स , !
वो आइना अपने आंचल से बहुत बार साफ़ किया जिसे मैंने !
उम्र की हर लकीर मेरे आँखों के नीचे दिखा देता है
ढूंढती हूं जब मैं वो जा काजल का कोर ,
पतंग की टूटी डोर थमा देता है मुझे ....
जवाब तलाशती हूँ मेरी तन्हाईओं का .. तो
सागर की बेनाम लहरों से मिला देता है मुझे
समेट कर अपने कमरे का हर कोना
तैयार हो जाती हूँ कुछ सफ़ेद कुछ काले .......
पलों को कैद कर कानो के नीचे,
निकल पड़ती हूँ, नया पन्ना लिखने .... रंग भर जायेंगे इसमें कभी तो...
इसकी उम्मीद में स्याही लाल कर लेती हूँ
उसमे रखी है, किताबे, और कुछ पुरानी डायरी , जिसमे कुछ किस्से नए है, पर बहुत से पुराने
हाँ वह दिया, मिटटी का , वही रखा है, अब लॉ जलाती नहीं जिसकी मैं ,
और वह ब्लू वाली दरी , कितनी ही बार हटाया मैंने उसे , पर आज भी बिछी है, वह बिस्तर के ठीक नीचे। कुछ चिट्ठियां अधखुली, पूरी पढ़ी , मेरे पसंदीदा नावेल के बीचोंबीच दबी हुई है !
कलम दान मेरा भरा हुआ है , कीमती कलमों से, लोग समझते है की मैं लिखने की शौक़ीन हूँ !
हर रात वो मोमबत्ती बुझा देती हूँ मैं , क्या लिखू ? यह सोचकर हरबार स्याही सूखा देती हूँ !.
वह दिवार वाली घड़ी याद है? कभी कभी बेवक़्त ही, पीछे खींच ले जाती है मुझे ,
मेज़ पर लगा नया कैलेंडर क्यों मुझे आज से रूबरू करा देता है !
रात जब थक कर दिन के धोखाधड़ी से , आँखे बंद करती हूँ तकिये पर अपनी
चादर की खींचातानी , क्यों सता जाती है आज भी
सपने में अचानक से उचककर जब जाग जाती हूँ, साथ में रखा गिलास गिर जाता है अक्सर ही
प्यासी सी फिर रात के साथ सो जाती हूँ डरकर !
सवेरे सब नया होता है, पुराना होता है तो बस मेरा अक्स , !
वो आइना अपने आंचल से बहुत बार साफ़ किया जिसे मैंने !
उम्र की हर लकीर मेरे आँखों के नीचे दिखा देता है
ढूंढती हूं जब मैं वो जा काजल का कोर ,
पतंग की टूटी डोर थमा देता है मुझे ....
जवाब तलाशती हूँ मेरी तन्हाईओं का .. तो
सागर की बेनाम लहरों से मिला देता है मुझे
समेट कर अपने कमरे का हर कोना
तैयार हो जाती हूँ कुछ सफ़ेद कुछ काले .......
पलों को कैद कर कानो के नीचे,
निकल पड़ती हूँ, नया पन्ना लिखने .... रंग भर जायेंगे इसमें कभी तो...
इसकी उम्मीद में स्याही लाल कर लेती हूँ