Thursday, 27 August 2015

सिलवटे

सिलवटों ने अँधेरी  रातों से हमरी चुगली की
रौंदते रहे जिन चाहतो को उन्होंने भी आज हमसे  मुह्जोली की

करीने से सिलते रहे हम अपनी खाइश्ो को
उधरते धागो ने खुलकर हमसे दिल्लगी की

कुसूर हमारा तो नहीं जो चले हम तनहा थे
फिर इन काटों ने हमसे ही क्यों ऐसी  ठिठोली की 

Monday, 24 August 2015

चोरी

आज  थोड़ी हेरा फेरी करते हैं 
ज़िंदगी की पूंजी से कुछ वक़्त चुराते हैं ... 

मद्धम  हो रही चांदनी  हैं 
थोड़े अलसाये  से  उस  सुबह को जगाते  हैं 

बेवक़्त  खर्च हो रहे लम्हे हैं 
आज बचपन की गुल्लक से कुछ चव्वनी  चुराते हैं 

बुँदे  भिगो रही  हैं  गुलिस्तां को 
क्यों न हम गीली मिटटी  की  थोड़ी  खुशबू  ही फैलाते  हैं 


घूँघट  में लिपटी शर्म है  
अजी हम तो बस  हया  की नज़ाकत  आजमाते  हैं ....

कहीं खाली तो  कहीं  छल्के  जाम  पड़े हैं 
कुछ टूटे  कुछ अधूरे सपने  बिखरे हैं ..
मयख़ाने  की इस बेहोशी  से  चलो  हम  कुछ पल  होश के उड़ाते हैं  .

ग़मगीन  आँखों के काजल में हसीन  दर्द को छुपा आते हैं .
माँ की गोद  में सोयी मासूमियत  के सपनो में चलो थोड़े फुर्सत के पल बिताते हैं





to be continued.. ....  jab tak kuch aur chori ke liye nai mil jata..

Saturday, 22 August 2015

भंवर

बेपरवाह यूँ होश बेखबर न कर
   कुछ उलझी कुछ सुलझी ये अनजान डगर है

महफूज़ रख इस दिल को कही
ये बंजारों का  शहर है

गोते हम खा तो लेते उम्मीदो के सागर में
पर कमबख्त ये तो मन का भंवर  है