बेपरवाह यूँ होश बेखबर न कर
कुछ उलझी कुछ सुलझी ये अनजान डगर है
महफूज़ रख इस दिल को कही
ये बंजारों का शहर है
गोते हम खा तो लेते उम्मीदो के सागर में
पर कमबख्त ये तो मन का भंवर है
कुछ उलझी कुछ सुलझी ये अनजान डगर है
महफूज़ रख इस दिल को कही
ये बंजारों का शहर है
गोते हम खा तो लेते उम्मीदो के सागर में
पर कमबख्त ये तो मन का भंवर है
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