आज थोड़ी हेरा फेरी करते हैं
ज़िंदगी की पूंजी से कुछ वक़्त चुराते हैं ...
मद्धम हो रही चांदनी हैं
थोड़े अलसाये से उस सुबह को जगाते हैं
बेवक़्त खर्च हो रहे लम्हे हैं
आज बचपन की गुल्लक से कुछ चव्वनी चुराते हैं
बुँदे भिगो रही हैं गुलिस्तां को
क्यों न हम गीली मिटटी की थोड़ी खुशबू ही फैलाते हैं
घूँघट में लिपटी शर्म है
अजी हम तो बस हया की नज़ाकत आजमाते हैं ....
कहीं खाली तो कहीं छल्के जाम पड़े हैं
कुछ टूटे कुछ अधूरे सपने बिखरे हैं ..
मयख़ाने की इस बेहोशी से चलो हम कुछ पल होश के उड़ाते हैं .
ग़मगीन आँखों के काजल में हसीन दर्द को छुपा आते हैं .
माँ की गोद में सोयी मासूमियत के सपनो में चलो थोड़े फुर्सत के पल बिताते हैं
to be continued.. .... jab tak kuch aur chori ke liye nai mil jata..
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