हल्के हल्के कोहरे के साये में शायद आसमां तक आ गयी हूँ
कुछ नए सपने संजोये देखो कहाँ तक आ गयी हूँ !
कैसे उकसाये किसी और को देखने को,
तेरा रास्ता तकते थकी हुई इन निगाहों को !
जो न आना हो तो झुठला ही देना,
सुस्ता लेंगी नींद की उन्माद में ,
शिव है तू मेरा ,तुझसे ही मैं बनी
कैलाश भी तेरा , गंगा भी तेरी
किया तूने ही संघार , चूर कर मनुष्य का अहंकार
कुछ नए सपने संजोये देखो कहाँ तक आ गयी हूँ !
कैसे उकसाये किसी और को देखने को,
तेरा रास्ता तकते थकी हुई इन निगाहों को !
जो न आना हो तो झुठला ही देना,
सुस्ता लेंगी नींद की उन्माद में ,
शिव है तू मेरा ,तुझसे ही मैं बनी
कैलाश भी तेरा , गंगा भी तेरी
किया तूने ही संघार , चूर कर मनुष्य का अहंकार