Friday, 11 January 2019

Halfs

हल्के  हल्के  कोहरे के साये  में शायद आसमां तक आ गयी हूँ
कुछ नए सपने संजोये देखो कहाँ तक आ गयी हूँ !



कैसे उकसाये  किसी और को देखने को,
तेरा रास्ता तकते थकी हुई इन निगाहों को !

जो न आना हो तो झुठला ही देना,
सुस्ता लेंगी नींद की उन्माद में ,


 शिव है तू मेरा ,तुझसे ही मैं बनी
कैलाश भी तेरा , गंगा भी तेरी
किया तूने ही  संघार , चूर कर मनुष्य  का अहंकार






No comments:

Post a Comment