Friday, 24 July 2015

बाजार

   संसार  का सेंसेक्स  आज  सुना  गर्म हैं 
वक़्त  कीमती और लम्हे फ़िज़ूल हैं 


तिजोरिया  हो रही सख्त और रिश्ते ग़मगीन हैं 
मंदिरों में भी  अब टंग  गयी  लोहे की ज़ंज़ीर है 
सुना है आज बाज़ार  काफी   मर्महीन  हैं 


मिज़ाज़   और  मौसम  में होर लगी है बदलने की   
उसूल  की कीमत  गिर गयी , जीत  बुलंद है 


पहले बेर चुराते थे बागो  से 
आज नज़रे  चुराते है  भगवान से 
कुछ  पाप  खुदरे और कुछ संगीन है 

सुना है आज बाज़ार  काफी   मर्महीन  हैं 







वजूद


नीलाम कर ख्वाइशों को अपनी
कुछ यूँ हम इश्क़ का क़र्ज़ उतारते रहे
 खण्डार हो रही मन की तिजोरी में  अश्को को सजाते रहे

तोड़ कर उसी कुण्डी को आज मैंने यादों  में  संभाला है। …
वजूद जो गुम  गया था  तेरे साये में , संवार  कर उसे निखारा हैं
वक़्त के दौर में मुझे   अपना सा मुकाम बनाना है 

Tuesday, 21 July 2015

ख़ुदग़र्ज़

 मतलबी  दुनिया   में खुदगर्ज़ चेहरे हैं
ख़ुशी में संग तो गम में अकेले हैं 

फीकी मुस्कान हैं होंठों पर 
 झूठी बातों का सफर  हैं 

           जहाँ गलियां खत्म हो खवाइशों की 
                         वहीं रिश्तों का भी अन्त हैं

 ढूंढने से भी नहीं मिलती हैं मंजिल
जिसकी मुझे तलाश हैं 

रास्ते तो अनगिनत  फिर भी दरमियाँ हैं