Tuesday, 10 January 2017

शिक़वा शिक़ायतों का शोर है दर पे तेरे
उम्मीदों  की कतार  है ! 

दबी जुबां हमने भी लिख दी है अर्ज़ी अपनी
फुरसत में पढ़ना 
"शुक्रिया" लिखा है !!
तेरी दी हुई इस  
मेहरबाँ ज़िन्दगी का !

Sunday, 8 January 2017

Anamika

गुड़ियों  से खेलते ,माँ के आँचल  में छुपते छुपाते
वक़्त ने खड़ा किया तुम्हे ससुराल  की दहलीज़ पे !

किसी  ने मुस्कराहट देखि, तो किसी ने आँखों की कोर  ,
हम तो  खुश हो लिए पकड़ कर आपके  लहँगे का एक छोर !

वक़्त और हालात से बखूबी लड़ते
 निभाई तुमने हर रस्म और परंपरा !

कभी बहु, कभी भाभी  , फिर हमारे सुने आँगन में दो फूल खिला
महकाया हमरा सर्वस्व,बहाया वह मधुर अमृतधारा

नहीं लुप्त होने  दिया अपने नारीत्व को एक  आँगन के भीतर
अपने अनन्त के साथ इस विश्व में लहराया अपने अस्तित्व का पंचम !

वेद और पुराण की ज्ञाता बनी
अपनी लेखनी से रच दिया एक नया पुराण
और साबित किया अपना असीम तेज़ और ज्ञान

अपनी पदवी से साकार किया अपना कुलनाम ,  
नहीं खोने दिया फिर भी बहुरानी का उपनाम !







Tuesday, 3 January 2017

बदल गए हो तुम

सुनो, वह तुम्ही हो न , जो सँभालते थे मेरे डगमगाते कदम
        तुम्ही तो हो, जिसने हिम्मत कभी बंधाई थी !

ये क्या हुआ तुम्हारे चेहरे को, क्यों अपरिचित सा दीखता है !
आवाज़ वही,  फिर क्यों तुम्हारा हर गीत अब अनमना सा लगता है !

सुना है सौदा कर आये हो अपने ईमान का
तभी तो कहु , क्यों ये रिश्ता स्याह लगता है!