सुनो, वह तुम्ही हो न , जो सँभालते थे मेरे डगमगाते कदम
तुम्ही तो हो, जिसने हिम्मत कभी बंधाई थी !
ये क्या हुआ तुम्हारे चेहरे को, क्यों अपरिचित सा दीखता है !
आवाज़ वही, फिर क्यों तुम्हारा हर गीत अब अनमना सा लगता है !
सुना है सौदा कर आये हो अपने ईमान का
तभी तो कहु , क्यों ये रिश्ता स्याह लगता है!
तुम्ही तो हो, जिसने हिम्मत कभी बंधाई थी !
ये क्या हुआ तुम्हारे चेहरे को, क्यों अपरिचित सा दीखता है !
आवाज़ वही, फिर क्यों तुम्हारा हर गीत अब अनमना सा लगता है !
सुना है सौदा कर आये हो अपने ईमान का
तभी तो कहु , क्यों ये रिश्ता स्याह लगता है!
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