Sunday, 17 January 2016

बारूद

जल उठा था शहर बारूद के उस धमाके से 
आग की लपटे और काले धुएं में 

शोर था काफी लोगो के कौतूहल का  ,लाशे खामोश थी 
किसी बिन ब्याही का सिंदूर शांत पड़ा था , हाथो में रसीद थी शादी के जोड़े की 
वही कुछ दूर घर का मजदुर छुट्टी प् चूका था हमेशा के लिए ,
सोया था एक माँ का लाडला भी कभी न खुलने वाली नींद में 

दो रोटिया एक टिफ़िन की  बिखरी पड़ी थी 
हक़दार आज  भूखा ही रह गया 

सुबह तो हुई थी इनकी भी 
रात से इनका दर्द देखा न गया 

बड़ी ही शिद्दत से जलाया था शहर  ज़ालिम ने। ... 



Thursday, 14 January 2016

ख्वाइशें

संभाल  के रख दिए तकिये के नीचे  खाइश्ो को  मैंने 
कुछ ख्वाब में पुरे हो  शायद 

ये सोच पलके भी  मूंद  ली 


Wednesday, 13 January 2016

मयखाना

आ जाते हैं मयखाने में लोग
कुछ ग़म मिटाने को
कुछ शाम बिताने को

हमने भी कदम बढ़ाया है
एक  जाम होठों से लगाया है
कुछ घाव पुराने खरोच कर खुद को उकसाया है
कुछ को इसी गहरी शाम में प्यार से दफनाया है.



बंदगी

खरीदार बताते है घाटे का सौदा उसे

जो लापरवाहियां  ले उनकी हमने
सुकून अपना गवां दिया

 वह समझते है इश्क़  जिसे
हमने बंदगी उसे बना लिया