आज बैठी सोचने जो की हो रही बेवक़्त बारिश क्यों?
है कैसा ये नरसंहार ,जहाँ अंतिम विदाई में भी नहीं अपनों का साथ |
देश और विदेश की सीमा भी है पार, क्यों सब हुए इतने लाचार ?
बेचैन सी मैं, जोड़े नमन में दोनों हाथ ,मन के कोने से स्वयं आया जवाब
कहीं खुद ही तो नहीं हम खुद के गुनाहगार ?
प्रकृति से मिली हर भेंट का निर्ममता से किया तिरस्कार
पवित्र नदिया और सागर विशाल ,अपने ढोंग के अवशेष को कर अर्पित इनमे
रुलाया हमने इन्हे न जाने कितनी ही बार
वह धरती जो निवाला देती सबको, उसमे भांग और धतूरा ऊगा , उसे भी श्रापित किया हमने
एक माँ की प्रतिमा दूसरे की गोद में मिला, माँ शब्द को ही नापाक किया हमने
वह धरती जो निवाला देती सबको, उसमे भांग और धतूरा ऊगा , उसे भी श्रापित किया हमने
एक माँ की प्रतिमा दूसरे की गोद में मिला, माँ शब्द को ही नापाक किया हमने
ऊँचे पर्वतों को तोड़ ,उनकी भुजाओ को काट हमने बनाया वहां भी अपना स्थान
क्यों चाँद पे जा पहुंचे हम, धरती को उसके ही सूत्रों से करके विलीन
चिड़ियों को कर पिंजरे मैं कैद ,पशुओं में बांध दी जंजीर
कुदरत से लड़कर हम बने महावीर
उनको शायद अब नहीं ये गंवारा
बेवजह ही उनके अभिमान को हमने यूँ ललकारा
दो सज़ा इतनी ईश्वर की तुम्हारे होने का एहसास हो
वह सब जो खुद को भगवान समझ बैठे हैं , उन्हें भी तेरे शक्ति का आभास हो
मनुष्य जाती के खुद के निर्मित अभिशाप का उसे खुद ही तो ज्ञात हो