तू रूठ जाती है मुझसे
मैं हर बार मना लेती हूँ तुझे
ज़िंदगी , बड़ी कीमती सी लगती है, हर लम्हा तू यूँ जब फिसलती है
इंकार नहीं तेरी खुबसुरतियों से
उसके अक्स में क्यों फिर तुझे ढूंढती हूँ ?
खुद के हौसलों पे यकीन है मुझे
क्यों कर फिर ,हर मोड़ पर पलटकर देख लेती हूँ ?
"मैं " अहम् सा लगता है , "हम " से ही क्यों फिर पूरी हो जाती हूँ
मैं हर बार मना लेती हूँ तुझे
ज़िंदगी , बड़ी कीमती सी लगती है, हर लम्हा तू यूँ जब फिसलती है
इंकार नहीं तेरी खुबसुरतियों से
उसके अक्स में क्यों फिर तुझे ढूंढती हूँ ?
खुद के हौसलों पे यकीन है मुझे
क्यों कर फिर ,हर मोड़ पर पलटकर देख लेती हूँ ?
"मैं " अहम् सा लगता है , "हम " से ही क्यों फिर पूरी हो जाती हूँ