Sunday, 17 January 2016

बारूद

जल उठा था शहर बारूद के उस धमाके से 
आग की लपटे और काले धुएं में 

शोर था काफी लोगो के कौतूहल का  ,लाशे खामोश थी 
किसी बिन ब्याही का सिंदूर शांत पड़ा था , हाथो में रसीद थी शादी के जोड़े की 
वही कुछ दूर घर का मजदुर छुट्टी प् चूका था हमेशा के लिए ,
सोया था एक माँ का लाडला भी कभी न खुलने वाली नींद में 

दो रोटिया एक टिफ़िन की  बिखरी पड़ी थी 
हक़दार आज  भूखा ही रह गया 

सुबह तो हुई थी इनकी भी 
रात से इनका दर्द देखा न गया 

बड़ी ही शिद्दत से जलाया था शहर  ज़ालिम ने। ... 



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