Sunday, 8 January 2017

Anamika

गुड़ियों  से खेलते ,माँ के आँचल  में छुपते छुपाते
वक़्त ने खड़ा किया तुम्हे ससुराल  की दहलीज़ पे !

किसी  ने मुस्कराहट देखि, तो किसी ने आँखों की कोर  ,
हम तो  खुश हो लिए पकड़ कर आपके  लहँगे का एक छोर !

वक़्त और हालात से बखूबी लड़ते
 निभाई तुमने हर रस्म और परंपरा !

कभी बहु, कभी भाभी  , फिर हमारे सुने आँगन में दो फूल खिला
महकाया हमरा सर्वस्व,बहाया वह मधुर अमृतधारा

नहीं लुप्त होने  दिया अपने नारीत्व को एक  आँगन के भीतर
अपने अनन्त के साथ इस विश्व में लहराया अपने अस्तित्व का पंचम !

वेद और पुराण की ज्ञाता बनी
अपनी लेखनी से रच दिया एक नया पुराण
और साबित किया अपना असीम तेज़ और ज्ञान

अपनी पदवी से साकार किया अपना कुलनाम ,  
नहीं खोने दिया फिर भी बहुरानी का उपनाम !







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