Friday, 24 July 2015

वजूद


नीलाम कर ख्वाइशों को अपनी
कुछ यूँ हम इश्क़ का क़र्ज़ उतारते रहे
 खण्डार हो रही मन की तिजोरी में  अश्को को सजाते रहे

तोड़ कर उसी कुण्डी को आज मैंने यादों  में  संभाला है। …
वजूद जो गुम  गया था  तेरे साये में , संवार  कर उसे निखारा हैं
वक़्त के दौर में मुझे   अपना सा मुकाम बनाना है 

3 comments:

  1. Labz kuchh aese bhi the sajoye,, ye hame na maloom tha... kuchh aapki umra ka nateeza ... to kuchh hamaare sath ka ishara hai

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