सिलवटों ने अँधेरी रातों से हमरी चुगली की
रौंदते रहे जिन चाहतो को उन्होंने भी आज हमसे मुह्जोली की
करीने से सिलते रहे हम अपनी खाइश्ो को
उधरते धागो ने खुलकर हमसे दिल्लगी की
कुसूर हमारा तो नहीं जो चले हम तनहा थे
फिर इन काटों ने हमसे ही क्यों ऐसी ठिठोली की
रौंदते रहे जिन चाहतो को उन्होंने भी आज हमसे मुह्जोली की
करीने से सिलते रहे हम अपनी खाइश्ो को
उधरते धागो ने खुलकर हमसे दिल्लगी की
कुसूर हमारा तो नहीं जो चले हम तनहा थे
फिर इन काटों ने हमसे ही क्यों ऐसी ठिठोली की
Always beautiful, but difficult for me :P
ReplyDeleteकरीने से सिलते रहे हम अपनी ख्वाहिशों को........ वाह क्या कहने :)
ReplyDeleteKya bat hai Shahi ji, bahut umda!!
ReplyDeleteYou are getting attuned to the path
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