Thursday, 18 April 2024

पापा

 

पापा , 

पापा  का होना क्या होता है ये उनके ना होने पे ही आभास होता है 

उनका  सिर्फ याद में होना और पास में ना होना अत्यंत असहनीय होता है ,

पापा ऐसे  जैसे  एक आँगन में  रखी  चारपाई, 

जहाँ पूरा परिवार जमघट लगाए रहता है , 

उनका होना जैसे गांव के बीच  नीम के पेड़ का चबूतरा जहाँ होती है हज़ारो बातें, किस्से कहानिया और नयी कल्पनाये 

पापा ऐसे जैसे उमड़ती नदी का बांध , 

जैसे महफ़िल के ठहाके  या शाबाशी की थाप ! 

उनके जाने से कदम  धीमे , और हौसले कमजोर हो जाते है! कुछ अपने भी बेगाने से हो जाते है !

घर की रौशनी मद्धम और खुशियां फीकी पड़ जाती है ,

 माँ का श्रृंगार और बच्चो  का उल्लास भी खत्म  हो जाता है  

आप हमेशा साथ  रहते है पापा बस आपका प्यार से बुलाना खल जाता है 

माँ का हमारे लिए खुश रहना  पर अकेले में रोना  अब सब समझ आ जाता है !

सुबह मेज़ पर राखी चाय और अख़बार में ढूंढते है  हम आपको , तो कभी किसी पुरानी  पढ़ी किताब में आपके उँगलियों  की खुशबू 

पॉलिटिक्स की चर्चे  नहीं होते अब, क्योकि कोई कड़क आवाज़ में नहीं सुनाता हिस्ट्री मशहूर 

गलती जो हो जाये अब ,तो डांटता  नहीं  कोई, और ना ही  गिरने पर झट से उठाता  ही है 

कुछ हासिल करने पर पीठ भी थपथपाता नहीं कोई, 

हाँ पर आप खुश  होते इससे ये सोच खुश हो जाते है हम सब ! 

पापा का ना होना क्या होता, ये जान गए हम सब।

उनकी अदृश्यता ने सिखाया, कैसे हैं हम अधूरे बिना उनके राब्ते।"


मिनाक्षी  (भावनाओं में शामिल , साक्षी और आकांक्षा ) 





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