तलवे उसके फटे हुए ,पर मजबूत
हाथों की मासपेशियां कसी हुई, भारी सामान का बोझ लिए सर पर
तेज़ी से लोगो के भीड़ से जगह बनाता जाता है !
सर पर रखी कभी किसी बुढ़िया का बक्सा होता है , बेटे के घर के लिए जिसमे ढेरो पकवान भरा होता है,
तो कभी बेटी के घर से लौट रहा कमजोर बाप का हल्का सा थैला!
अपने ही बोझ से थके हुए हलके थैले को भी दे देता है उस सख्त मांसपेशीय वाले को !
सुबह की पहली गाड़ी के आते ही नया भार उठाने की आस में ,वह चाय बिस्किट खाकर दौड़ जाता है फलना शहर के फलना लोगो की तरफ
हर रोज़ दो शब्द बतिया लेता है सब से , कोई घर को आता है, कोई घर जाता है,
कोई नौकरी की तलाश में तो कोई हज़ारो सपने लिए , सबका सामान और रफ़्तार अलग होता है,
वह सबका ही सामान उठाता है , सबकी अलग बोली लगाता है !
माथे का पसीना पोंछता अपने लाल गमछे से, वह अकसर दोपहर तक थक जाता है, उसने सीढ़ियां गिन रखी है , कौन सा डब्बा कहा आएगा, सेठ जी से कितना मोल भाव हो पायेगा, बखूबी जान जाता है
उसका अपना सामान हल्का है काफी और ज़िम्मेदारियाँ भारी,
बेटी का ब्याह करना है, सामान उठाने वाले से नहीं, उठवाने वाले से
सपने ऐसे उसके आँखों में रोज़ ही तैरते है , काली सिलेट पर लिखा रेट कार्ड धूमिल पड़ जाता है जब वह दिन का आखिरी बोझ सर से उतारता है!
मिनाक्षी
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