बुझते हुए अरमानो को सुलगाया मैंने
पुराने बक्से में रखी गुड़िया को सजाया मैंने
पुराने बक्से में रखी गुड़िया को सजाया मैंने
घुटने जब छीलते थे गिरने से
उस चोट को आज फिर सहलाया मैंने!
क्यों सयाने हो गए हम इतने
की आज गिराते है दुसरो को,
ये सवाल खुद ही दुहराया मैंने
लड़ता था उस मीठी गोली के लिए जो
उस रूठे मन को आज फिर मनाया मैंने
दिखा रही है ज़िंदगी जो आईना
उस सच को आज भरमाया मैंने
काश सहेज पाते उसे
जिस बचपन को रोज़ ही गवाया हमने
बेहद खूबसूरत
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