Sunday, 16 September 2018

चूड़ियां

कभी  खनकती थी  सतरंगी कलाई जिनसे,
दो टूट गयी उनमे, पहले प्यार की तकरार में !
     
          दो और चूर हुई  बच्चो के  मान और गुहार में !
         
लाल और हरी जो संजोयी थी साज़  के सामान में,
  वह आज बिखरी है खामोश, सफ़ेद सम्मान में!!

मिनाक्षी 

1 comment:

  1. nice one
    do check my poems also how it is
    dubeyyash.blogspot.com

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