कभी खनकती थी सतरंगी कलाई जिनसे,
दो टूट गयी उनमे, पहले प्यार की तकरार में !
दो और चूर हुई बच्चो के मान और गुहार में !
लाल और हरी जो संजोयी थी साज़ के सामान में,
वह आज बिखरी है खामोश, सफ़ेद सम्मान में!!
मिनाक्षी
दो टूट गयी उनमे, पहले प्यार की तकरार में !
दो और चूर हुई बच्चो के मान और गुहार में !
लाल और हरी जो संजोयी थी साज़ के सामान में,
वह आज बिखरी है खामोश, सफ़ेद सम्मान में!!
मिनाक्षी
nice one
ReplyDeletedo check my poems also how it is
dubeyyash.blogspot.com