Saturday, 10 February 2018

Hum

तू रूठ  जाती है मुझसे
मैं हर बार मना  लेती हूँ  तुझे
ज़िंदगी , बड़ी कीमती सी लगती है, हर लम्हा तू यूँ जब फिसलती है

इंकार नहीं तेरी खुबसुरतियों से
उसके अक्स में क्यों  फिर तुझे ढूंढती हूँ ?

खुद के हौसलों पे यकीन है मुझे
क्यों कर फिर ,हर मोड़ पर पलटकर देख लेती हूँ ?

"मैं " अहम् सा लगता है , "हम " से ही क्यों फिर पूरी हो जाती हूँ

1 comment:

  1. सच में जिंदगी बड़ी कीमती है!

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