Wednesday, 1 April 2015

पैगाम

किसी डाकखाने में ऐसा कोई किरानी हो
    थोड़ा संगीन थोड़ा मनमानी हो
कुछ यूँ गुज़ारिश कर सके हम जिससे
                                की कुछ कोरे कागज़, बंद लिफाफो में घरो में तुम्हे पहुचानी है। ....
                                 आस खत्म  हो चुकी है जहाँ,. उन खयालो में चिंगारी लगानी है
 नाम अपना पढ़ कर कुछ पल खुश हो जायेंगे लोग
फिर चाहे  क्यों न  वह लिफाफा ही खाली हो। …


1 comment:

  1. Awesome expression..you are going great with different thought patterns.

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