Thursday, 5 February 2015

तुम

इक प्याली चाय की रखना मेरी भी
जब शाम धुंधली हो 
एक याद मीठी सी 
जब कोरी सी तन्हाई हो 

 बुला लेना  हमें जब
रास्ते थकने लगे 
साथ आ जायेंगे हम। । 

हालात रूठ  गए  जरूर हैं
अपनी हदों  से कुछ यूँ हम  मजबूर जरूर हैं 


दो कदम साथ कभी चले तो थे 
एक कदम बढ़ा लेना तुम 
गर फिसल रहे मेरे हो

एक प्याली चाय की रखना मेरी भी
ये वादा  था तुम्हारा
ये कसम याद रखना  अपनी भी 


3 comments:

  1. Very beautifully written.... quite deep :)

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  2. कितनी सुंदर कविता है आप बहुत अच्छा लिखते हो ❤️😘😍

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