ठंडी की एक रात थोड़ा जाग लेना तुम,
मैं भी देख लुंगी देर से हुई सुबह को !
रिश्तों की गर्माहट साथ में बाटीं थी,
अब ठंडी हुई शाम भी बिताएंगे
एक तरफ तुम, एक तरफ मैं !
लुढ़क जाती है कुछ बुँदे अक्सर ,तुम्हारा ख्याल जब भी आता है,
दिलासा तुम्हारे प्यार का खुद को देती हुँ
कभी तुम बनकर ,कभी मैं बनकर!
तुम सोचन मत ज्यादा , हम दोनों ही रख लेते है
मुझमे थोड़ा सा तुम, तुममे थोड़ा सा मैं !
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