Tuesday, 15 September 2020

थोड़ा तुम,थोड़ा मैं

 ठंडी की एक रात थोड़ा जाग लेना तुम,

 मैं भी देख लुंगी देर से हुई सुबह को !

रिश्तों की गर्माहट साथ में बाटीं थी, 
अब ठंडी हुई शाम भी बिताएंगे 
एक तरफ तुम, एक तरफ मैं !

लुढ़क जाती है कुछ बुँदे अक्सर ,तुम्हारा ख्याल जब भी आता है, 
दिलासा तुम्हारे प्यार का खुद को देती हुँ 
कभी तुम बनकर ,कभी मैं बनकर! 

तुम सोचन मत ज्यादा , हम दोनों ही रख लेते है

मुझमे थोड़ा सा तुम, तुममे थोड़ा सा मैं !




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