सूखे पत्तो की सरसराहट कैसे डसती होगी उस शाख को ,
जिसने कभी गुलिस्तां को सजाया था !
पथराई सी आँखे जैसे ढूंढती हो ,
कभी न लौट के आने वाले उन परिंदो को !
इंतज़ार है दोनों को ,
एक को फ़िज़ायों का
दूजे को खयालो का
जिसने कभी गुलिस्तां को सजाया था !
पथराई सी आँखे जैसे ढूंढती हो ,
कभी न लौट के आने वाले उन परिंदो को !
इंतज़ार है दोनों को ,
एक को फ़िज़ायों का
दूजे को खयालो का
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